HII दोस्तो कैसे हैं आप सब
आज आप सभी को प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त (Plate Tectonic Theory) के बारे में बताया गया है, जो भी आपके परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है वह आपको दी जा रही है। दोस्तो जानने के लिए बहोत सी बातें है पर मैं आपको उतना ही बताऊंगा जितने से 90 –99 % उम्मीद है आएगी इसलिए मैने उन बातों को नही लिए जिनके आने के कम उम्मीद है। इसलिए आपको जितना इसमे बताया जा रहा है उतना आप जरूर याद रखे और दोस्तो अगर आपको पसंद आये तो प्लीज शेयर करे और अगर कुछ सुझाव या प्रश्न हो तो कॉमेंट बॉक्स में लिखे, हम आपके सवाल का जवाब जल्द से जल्द देने का प्रयास करेंगे।
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प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त (PLATE TECHTONIC THEORY)
पृथ्वी के दो महत्वपूर्ण भाग हैं - महासागर और महाद्वीप, ये प्रथम
श्रेणी के उच्चावच हैं।
पृथ्वी के 70.8% भाग पर महासागरों तथा 29.2% भाग पर महाद्वीपों का विस्तार है।
उत्तरी गोलार्द्ध पर दक्षिणी गोलार्द्ध की अपेक्षा अधिक
स्थलीय भाग है।
इसलिए उत्तरी गोलार्द्ध को स्थल
गोलार्द्ध भी कहते हैं।
उत्तरी गोलार्द्ध का लगभग 60% भाग स्थलीय है।
जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध पर जल की अधिकता है।
इस गोलार्द्ध पर लगभग 81%
जल पाया जाता है। इसलिए इसे जलीय
गोलार्द्ध भी कहते हैं।
ऐसा माना जाता है कि महाद्वीप एक
दूसरे से दूर खिसक रहे हैं।
इस सम्बन्ध में समय समय पर भिन्न भिन्न सिद्धान्तों का
प्रतिपादन किया गया जिनमें कुछ प्रमुख निम्नलिखित हैं।
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत प्लेटों के
स्वभाव एवं प्रवाह से सम्बन्धित अध्ययन है।
इस सिद्धांत का प्रतिपादन 1960 के दशक में किया गया।
हैरी
हेस, विल्सन, मार्गन, मैकेन्जी तथा पार्कर आदि विद्वानों ने इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत द्वारा समुद्री तल प्रसार, महाद्वीपीय विस्थापन, भूपटलीय संरचना, भूकम्प एवं
ज्वालामुखी क्रिया आदि की व्याख्या की जा सकती है।
प्लेट टेक्टोनिक्स सिद्धांत के अनुसार स्थलमण्डल कई दृढ़ प्लेटों के रूप में विभाजित है।
ये प्लेटें स्थलमण्डल के नीचे स्थित दुर्बलता मंडल के ऊपर तैर रही है।
इस सिद्धांत के अनुसार भूगर्भ
में उत्पन्न ऊष्मीय संवहनीय
धाराओं के प्रभाव
के अंतर्गत महाद्वीपीय और महासागरीय प्लेटें विभिन्न दिशाओं में विस्थापित होती रहती है।
प्लेट को महासागरीय या महाद्वीपीय प्लेट कब कहा जाता है ?
एक प्लेट को महाद्वीपीय या महासागरीय प्लेट कहा जाता है।
यह इस बात पर निर्भर करता है कि इस प्लेट का अधिकतर
भाग कहाँ अवस्थित है।
जैसे- प्रशांत
प्लेट मुख्यत -: महासागरीय प्लेट है क्योंकि इस प्लेट के अधिकतर भाग पर जल है।
जबकि यूरेशियाई प्लेट को
महाद्वीपीय प्लेट कहा जाता है क्योंकि इस प्लेट के अधिकतर भाग पर स्थल है।
भूपटल में प्लेटो की कुल संख्या कितनी है ?
इस सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी का
भू-पटल मुख्यतः छः बड़े और छः छोटे प्लेटों में विभाजित है तथा ये प्लेटें लगातार गति कर रही हैं।
ये प्लेटें एक-दूसरे के संदर्भ में तथा पृथ्वी के
घूर्णन-अक्ष के संदर्भ में निरंतर गति कर रही है।
नोट :-
कुछ विद्वान अमेरिकन
प्लेट को उत्तरी
तथा दक्षिणी दो अलग-अलग प्लेट मानते हुए मुख्य प्लेटों
की संख्या 7 बताते हैं।
नासा के अनुसार
बड़ी प्लेटो की संख्या आठ है और छोटी प्लेटो
की संख्या लगभग
23 से भी ज्यादा है।
इनके अनुसार अमेरिकन यूरेशियन अफ्रीकन ऑस्ट्रेलियन अंटार्कटिका इंडियन आदि
बड़ी प्लेटो के उदाहरण है।
तथा मेडागास्कर जापान इंडोनेशिया कैरेबियन इत्यादि छोटे प्लेटो के उदाहरण है।
प्लेटो में गति कितने प्रकार की होती है ??
प्लेटों में यह गति
तीन प्रकार से संचालित होती है -
अपसारी
गति
अभिसारी गति
संरक्षी गति या समानांतर गति।
अपसारी गति (Divergent Movement)
अपसारी गति में प्लेटें
एक दूसरे से विपरीत दिशा में गतिशील होती हैं।
इसमें दोनों
प्लेटों के मध्य भ्रंश का निर्माण होता है जिसके सहारे मैग्मा का प्रवाह
पृथ्वी की सतह पर होता है।
इससे नवीन
भूपर्पटी का निर्माण होता है। मध्य अटलान्टिक कटक इस गति का सर्वोत्तम उदाहरण है।
अभिसारी गति (Convergent Movement)
अभिसारी गति में दो
प्लेटें एक दूसरे की ओर आ रही होती है जिससे यह आपस में टकराती है।
तथा इस प्रक्रिया में अधिक घनत्व वाला प्लेट कम घनत्व वाले प्लेट के नीचे चला जाता है।
विश्व के वलित
पर्वत, ज्वालामुखी, भूंकप व द्वीपीय चाप की व्याख्या इसी गति के द्वारा संभव है।
यह अभिसरण तीन प्रकार से होता है -
महासागरीय - महाद्वीपीय प्लेट
महासागरीय - महासागरीय प्लेट
महाद्वीपीय - महाद्वीपीय प्लेट
अभिसारी गति के सन्दर्भ में निम्न तथ्य महत्वपूर्ण हैं -
अधिक
घनत्व वाला प्लेट नीचे क्षेपित होता है तथा कम
घनत्व वाला प्लेट संपीडित होने के कारण वलित हो जाता है।
प्लेटें अधिक गहराई में ’’ बेनी आफ जोन’’ में जाकर पिघल
जाती हैं।
जैसे -
इसी प्रक्रिया से हिमालय व
आल्प्स पर्वत का निर्माण हुआ है।
हिमालय पर्वत शृंखला का निर्माण भारतीय
प्लेट तथा यूरेशियाई प्लेटों
की अभिसरण गति के फलस्वरूप टेथिस सागर के मलबों एवं भूपटल में मोड़ के फलस्वरूप हुआ।
अफ्रीकी एवं यूरेशियाई प्लेट के अभिसरण के
फलस्वरूप आल्प्स एवं एटलस पर्वत का निर्माण हुआ।
राकी एवं एण्डीज
पर्वत का निर्माण
महाद्वीपीय-महासागरीय गति के परिणामस्वरूप हुआ है।
महाद्वीपीय-महासागरीय प्लेटों के अभिसरण में अधिक घनत्व वाली महासागरीय प्लेट का महाद्वीपीय प्लेट के नीचे क्षेपण हो जाता है।
तथा अत्यधिक संपीडन के कारण प्लेट के किनारे के पदार्थों का वलन होता है। जिससे मोड़दार पर्वतों की उत्पत्ति होती है।
संरक्षी गति (Transform Movement)
संरक्षी गति में प्लेटें एक-दूसरे के साथ क्षैतिज दिशा में प्रवाहित होती हैं।
इस प्रक्रिया में न तो नये क्रस्ट का निर्माण होता है और न ही विनाश।
प्लेटों के घर्षण के कारण इन क्षेत्रों में भूकंप उत्पन्न होता है।
सेन एंड्रियाज भ्रंश (कैलिफोर्निया) का निर्माण इसी गति के कारण हुआ है।
ज्वालामुखी के विस्फोट से लावा जलवाष्प खनिज पदार्थ कंकड़ पत्थर राख गैस आदि बाहर निकलता है।
सिंडर शंकु इसका निर्माण इनका निर्माण राख धूल व असंगठित पदार्थों से होता है।
अतः ये कम ऊँचे होते हैं। इनमें लावा का अभाव होता है।
इनका ढाल 30° से 45° तक होता है। सिंडर शंकु 1200 फीट तक ऊंचा उठ सकता है।
उदाहरण - सिसली का ज्वालामुखी ,हवाई द्वीप का ज्वालामुखी
मिश्रित शंकु
यह सबसे बड़ा ज्वालामुखी शंकु होता है।
इसका निर्माण राख, खनिज, कंकड़ ,पत्थर, लावा के परत दर परत जमा होने के कारण बनता है।
उदाहरण - स्ट्रांबोली
स्ट्रांबोली को भूमध्य सागर का प्रकाश स्तंभ भी कहा जाता है।
पारी पोषित शंकु
पारीपोषित शंकु सबसे छोटा शंकु होता है। शंकु पाइप के फटने के कारण बनता है। शास्ता का पारी पोषित शंकु सासवीना है यह रॉकी पर्वत की पश्चिम दिशा में स्थित है।
महत्वपूर्ण बातें
ज्वालामुखी विस्फोट के बाद लावा के सतह पर ठंडे होने का कारण शंकु का निर्माण होता है।
जब शंकु का निर्माण केवल राख के जमा होने के कारण होता है तब इसे सिंडर शंकु कहा जाता है।
जिसका निर्माण मैग्मा के पाइप के फट जाने के कारण होता है उसे पारी पोषित शंकु कहते हैं।
जिसका निर्माण लावा राख कंकड़ पत्थर इत्यादि के परत दर परत जमा होने के कारण होता है।
उसे मिश्रित शंकु कहते हैं। यह सबसे बड़ा शंकु होता है।
प्लेटो की
अपसारी गति
प्लेटो के अपसारी गति में दो प्लेट एक दूसरे से दूर जा रही होती है।
जिसके कारण नई प्लेटो का निर्माण, ज्वालामुखी क्रिया, भूकंप, शांत प्रकार का ज्वालामुखी, ज्वालामुखी गुंबद, ज्वालामुखी पठार का निर्माण होता है।
प्लेटो की
अभीसारी गति
प्लेटो की अभीसारी गति के कारण यदि प्लेटें महासागरीय हो तो महासागरीय गर्त, महासागर के द्वीप, ज्वालामुखी इत्यादि का निर्माण होता है।
इंडोनेशिया, जापान, क्यूबा इत्यादि इसके उदाहरण है।
प्लेटो की
समांतर गति
प्लेटो के समांतर गति के कारण प्लेटो का संक्षरण, भूकंपीय घटनाएं और भूकंप घटनाओं की बारंबारता अधिक होती है।
प्लेटो के समांतर गति के कारण ज्वालामुखी घटनाएं पर्वत का निर्माण नहीं होता है।
प्लेटो के समांतर गति के कारण दोनों प्लेटों के बीच रगड़ बहुत अधिक होती है जिसके कारण विशाल मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती है और यही उर्जा भूकंप का कारण बनती है।
प्लेटो के गति का कारण क्या होता है ??
पृथ्वी का गर्भ बहुत अधिक गर्म होता है।
और
गर्भ गर्म क्यों होता है ?
क्योंकि पृथ्वी के अंदर गर्भ में दबाव अधिक होता है।
जिसके कारण घर्षण बहुत अधिक होती है।
जिसके कारण ताप बहुत अधिक होता है।
और जिसके कारण उष्मा बहुत अधिक मात्रा में उत्पन्न होती है।
और इसी मुक्त ऊर्जा के कारण पृथ्वी गति करती है।
पृथ्वी के आंतरिक भाग में रेडियो सक्रिय पदार्थ उपस्थित होते हैं जैसे यूरेनियम थोरियम कैडमियम इत्यादि।
पृथ्वी की सतह पर उपस्थित प्लेटें संवहन तरंगों के कारण विभिन्न प्रकार की गतियां करती है।
यह सब तरंग पृथ्वी के आंतरिक भाग हॉटस्पॉट की उपस्थिति के कारण जन्म लेती है।
हॉटस्पॉट या
तप्त स्थल जिसे हिंदी में कहा जाता है।
वह स्थान होता है पृथ्वी के आंतरिक भाग में जहां अधिक दबाव तथा रेडियो सक्रिय पदार्थ की उपस्थिति होती है।
जिसके कारण कोर से बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती है। जिसके कारण तापमान बहुत अधिक हो जाता है।
प्लेट की इन्फॉर्मेशन आपने दी काफी अच्छा लगा देखकर बहुत सुंदर 👌
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